सोमवार, मई 22, 2017

ओ मेरे  पूज्य    पिता जी,


[दिनांक 30 अप्रैल 2017 को मेरे पूजनीय पिता जी श्री ठाकुर  ईश्वर सिंह इस भू लोक को त्याग कर चले गये...
जीवन में उनकी कठिन तपस्या से ही आज हम   सुखद जीवन जी पा रहे हैं....]
"हे ईश्वर मेरे पूजनीय पिता जी को....अपने पावन चरणों में स्थान देना...."

ओ मेरे  पूज्य    पिता जी,
कल तक मैं
खुद को  दुनिया का
 सब से बड़ा आदमी  समझता था
क्यों कि मेरे सिर पर
 तुम्हारा हाथ था....
हम नहीं जानते
हम कौन हैं,
पर तुम भिष्म थे,
जिन्होंने  हमारे घर रूपी हस्तिनापुर को
चारों ओर से सुर्क्षित कर के ही,
ये भू लोक त्यागा...
जब से दुनिया में आएं हैं,
न ईश्वर को देखा कभी
ब्रह्मा   थे तुम
हमे जन्म देने वाले,
विष्‍णु    थे तुम ही
हमारा पालन करने वाले....
तुम तो
नील-कंठ शिव थे,
जिन्होंने हमे तो अमृत दिया,
पर हमारे भाग का
सारा विष ही,
आजीवन ही पीते रहे....
मैं जानता हूं
राजा-महाराजाओं की तरह
तुम्हारा इतिहास नहीं लिखा जाएगा,
जिन पर तुमने उपकार किये थे,
वो भी भूल जाएंगे तुम्हे,
पर मेरे मन मंदिर में तो तुम,
कभी नहीं मरोगे....



मंगलवार, अप्रैल 11, 2017

...केवल संस्कार दो...

शूल की चुभन,
बहुत पीड़ा देती है,
पर शायद
उतनी पीडा नहीं,
जितनी फूल की चुभन,
....देती है....
वो बेटे
भूल चुके हैं  सब कुछ
अपने  मां-बाप को भी,
उन के सप नों को भी,
जिन्हे  याद है अब
...केवल नशा ...
जो माएं
मांगती रही दुआ
लंबी आयु की
अपने बेटों  के लिये
आज वो भी अपनी दुआ में,
....
अपनी खुशियांं  ही मांग रही है...
वो माएं   सब से
यही कह रही है
बच्चों  के लिये
न मांगो लंबी आयु की दुआ
न धन दौलत
...केवल संस्कार दो...

बुधवार, फ़रवरी 01, 2017

तुम बैठे हो आसन पर आज हम शोर मचाएंगे,

तुम बैठे हो आसन  पर
आज हम शोर मचाएंगे,
तुम्हारे अच्छे कामों को भी,
मिट्टी में ही  मिलाएंगे...
तुमने भी यही किया,
अब हम भी यही करेंगे,
पहले तुमने हमे गिराया,
अब फिर   तुम्हे गिराएंगे...
जंता तो है घरों में बैठी,
वो क्या जाने सत्य क्या है,
किसी पर झूठे आरोप लगे हैं,
कोई दोषी  भी बच जाएंगे...
कभी जो  गले मिलते थे,
आज हाथ भी नहीं मिलाते,
ये राजनितिक समिकरण है भाई,
क्या पता फिर एक हो जाएंगे...
कभी दल बदला, कभी दल बनाया,
कभी गधे को भी बाप बनाया,
जानते हैं ये जनता को,
कुछ दिनों में सब भूल जाएंगे...


शनिवार, जनवरी 28, 2017

हम हिंदूस्तान को भूल गये,

इंडिया-इंडिया कहते-कहते,
हम हिंदूस्तान को भूल गये,
आजाद हो गये लेकिन फिर भी,
अपनी पहचान ही भूल गये।...
जलाते हैं दिवाली में पटाखे,
खेलते हैं रंगों से होली,
याद रहा रावण को जलाना,
राम-कृष्ण को भूल गये...
नहीं पता अब बच्चों को,
बुद्ध,  महावीर, गोविंद  कौन हैं?
मुगलों का इतिहास याद है,
पृथवीराज, राणा को भूल गये...
मां-बाप को आश्रम में भेजकर,
घर में हैं  कुत्ते  पाले,
फेसबुक, ट्वीटर   पर  दोस्त कई हैं,
अपने परिवार को भूल गये...
इतिहास में पढ़ाते हैं,
कब कब किसने यहां शासन किया,
हम क्यों विदेशियों के  गुलाम हुए,
ये पढ़ाना ही भूल गये...
वापिस लाओ, अपना  स्वर्णिम अतीत,
वो संस्कृति, वो सभ्यता,
वर्ना हो जाएंगे फिर गुलाम,
अगर भारत को भूल गये...

शुक्रवार, जनवरी 27, 2017

गणतंत्र का अर्थ, अब जान गये।

जो समझते रहे हमें वोट,
हार उन्हे पहनाते रहे,
गणतंत्र-दिवस मनाते-मनाते,
 गणतंत्र का अर्थ, अब जान गये।
दिया किसी ने आरक्षण,
किसी ने सस्ती दालें दी,
खाकर सभाओं में लड्डू,
बस तालियां बजाते रहे,
गिराकर मंदिर-मस्जिद,
बस करा दिये दंगे,
उनको तो मिल गया राज,
हम व्यर्थ ही खून बहाते रहे।
हीरन सिंह  भी  एक  साथ,
रहते थे राम राज्य में,
हम सब तो हैं इनसान,
क्यों नफरत के शूल बिछाते रहे।
न देंगे हम अब वोट,
जाति, धर्म क्षेत्र के नाम पर,
पटेल, शास्त्रि की जगह हम,
गिरगिट, उलुओं को  जिताते रहे।

बुधवार, जनवरी 18, 2017

इस कड़ाके की सर्दी में... 

इस कड़ाके की सर्दी में,
वो इकठ्ठा परिवार ढूंढता   हूं।
 दादा दादी की कहानियां,
चाचा-चाची का प्यार ढूंढता   हूं...
खेलते थे अनेकों खेल,
लगता था झमघट बच्चों का,
मोबाइल, टीवी के शोर में,
बच्चों का संसार ढूंढता  हूं...
लगी रहती थी घर में,
अतिथियों  से रौनक,
पल-पल सुनाई देती आहटों में,
कोई पल यादगार ढूंढता   हूं...
बदल गया है अब समय,
 आग नहीं  अब हीटर जलते हैं,
न जाने क्यों मैं आज भी,
पुराना समय बार-बार ढूंढता हूं...

शुक्रवार, जनवरी 13, 2017

दुनियां में।

हम आए अकेले, इस दुनियां में,
न लाए साथ कुछ दुनियां में,
शक्स ही रहे तो मर जाएंगे,
बनो शक्सियत इस दुनियां में।
जो भी मन में प्रश्न हैं,
उनका उत्तर गीता में पाओ,
जब ज्ञान दिया खुद ईश्वर ने,
क्यों भटक रहे हो दुनियां में।
जो ज्ञान न मिला भिष्म  को,
न द्रौण को, न विदुर को,
वो ही  ज्ञान अब  गीता का,
सब के पास है दुनियां में।
फिर भी सभि भ्रमित हैं,
अकारण ही चिंतित हैं,
न अर्जुन न दुर्योधन रहे,
उनके कर्म रहे इस दुनियां में।

शनिवार, नवंबर 19, 2016

उन्हे पूजता है तभी संसार...

नानक के इस धरा पर,
हैं गुरु आज, कई हजार,
पर  नानक सा   नहीं  है कोई,
इसी लिये है अंधकार...
जब भूल गये थे गीता को,
श्री कृष्ण की अमर कविता को,
   अन्याय, अधर्म  का राज्य था,
हो रहा था शोषण जंता का।
तब नानक ने गीता समझाई,
गुरु ग्रंथ में लिखा सार...
कहा था ये  दशम गुरु ने,
गुरु ग्रंथ को ही  गुरु मानना,
ये गुरु कौन है, कहां से आये,
फिर इन्हें गुरु क्यों मानना।
इन्हें देश धर्म की चिंता नहीं,
ये कर रहे हैं केवल व्यपार...
सरकारें चाहे कुछ भी करे,
ये गुरु हैं,  कुछ नहीं बोलते,
पांचाली के चीरहरण पर,
अब भी ये न मुंह खोलते।
भोली-भाली जंतां से,
मांगते हैं पैसा बेशुमार...
इन पर न कोई कर लगता,
ये खूब मौज उड़ाते हैं,
जब इनकी चोरी पकड़ी जाए,
 शिष्य शोर मचाते हैं।
इन्हें कानून का भय नहीं,
 ये हैं  धर्म के ठेकेदार...
राम ने रावण को मारा,
कृष्ण ने  कंस संहारा,
विष पीकर शंकर कहलाए,
गोविंद ने चार सुत गवाए।
युग-पुरुष वोही, जो युग को बदले,
उन्हे पूजता है तभी संसार...

बुधवार, अक्तूबर 19, 2016

फिर क्यों होगा तलाक...

जो  बच्चे,
 मां के साथ हैं,
पापा को ढूंढ़ते हैं,
जिन के पास, केवल  पापा हैं,
वो तरसते हैं,
मां की ममता को...
बच्चों को
आवश्यक्ता होती है,
दोनों के प्रेम की,
दोनों में से,
एक का न होना,
बच्चे का सबसे बड़ा दुर्भाग्य होता है...
जो माता-पिता,
तलाक के लिये,
कतार में खड़ें है,
वे अपने बच्चों की,
जीवन की सबसे बड़ी,
आवश्यक्ता छीन रहे हैं...
नहीं त्याग सकते,
दोनों अपने अहम   को,
अहम बच्चों से बड़ा है क्या?
विवाह  फेरों को समझो,
 आपस में विश्वास रखो,
    फिर क्यों होगा तलाक...


मंगलवार, अक्तूबर 11, 2016

विजयदशमी का संदेश यही है।

हम जलाते हैं हर बार,
पुतला केवल रावण का,
जिसने अपनी बहन के अपमान का
बदला लेने की खातिर
सीता जी का हरण किया।
न स्पर्श किया,
न अपमान किया,
अशोक-वाटिका में,
अतिथि सा मान दिया।
हम दशहरे के दिन,
 भूल जाते हैं,
आज के उन रावणों को,
जिन्हें न तीन वर्ष की बेटी की,
मासूमियत दिखती है,
न कौलिज जाने वाली बेटी की,
 मजबूरी ही।
वे केवल मौका पाकर,
उनकी जिंदगी तबाह कर देते हैं।
आज के ये रावण भी,
रावण का पुतला जलाते हैं,
इन्हें दंड दिये बिना,
हम कैसा दशहरा मनाते हैं।
श्री राम हमारे आदर्श हैं,
रावण फिर भी घूम रहे हैं,
हम केवल पुतले जलाकर,
मस्ति में झूम रहे हैं।
रावण मेघनाथ के पुतले जलाना,
विजयदशमी नहीं है,
अधर्मियों को दंडित करना,
विजयदशमी का संदेश यही है।
  

रविवार, सितंबर 04, 2016

मां के हाथ का भोजन ही  लगता है।


इन 32 वर्षों में,
सब कुछ बदला है।
पर्व, मेले,  त्योहार भी,
रिति-रिवाज, संस्कार भी।
पीपल नीम अब काट  दिये,
नल, उपवन भी बांट दिये,
अब चरखा भी कोई नहीं बुनता,
दादा की कहानियां भी नहीं सुनता।
मेरा गांव,  शहर बन गया,
भाईचारा  अपनापन गया।
पहले घर थे चार,
पर नहीं थी बीच में दिवार।
अब घर चालिस बन गये,
सब में गेट लग गये।
 अब आवाज देकर नहीं बुलाते,
मोबाइल से ही नंबर मिलाते।
पर आज भी नहीं बदली,
मेरे आनंद की वो गंगा,
जिसके पास,
स्नेह, ममता, त्याग,
आज भी पहले से अधिक है।
पर मैं जानता हूं,
वो अब थक चुकी है,
वो अब खाना नहीं बना  सकती,
पर नहीं मानती,
घर में  खाना वोही बनाती है।
वो नहीं देना चाहती,
अपना ये अधिकार किसी को,।
सत्य कहूं तो,
मुझे दुनियां में,
सबसे अच्छा,
मां के हाथ का भोजन ही  लगता है।

गुरुवार, अगस्त 18, 2016

राखी बांधते हुए, अपने भाइयों से कह रही है।

आज हर बहन खुद को
असुर्क्षित महसूस कर रही है।
राखी बांधते हुए
अपने भाइयों  से कह रही है।
केवल मेरी ही नहीं,
हर लड़की की    करना रक्षा,
भयभीत है आज सभी,
 सभी को चाहिये सुर्क्षा।
जानते हो तुम भया,
 दुशासन खुले   घूम रहे  हैं,
अकेली असहाय लड़कियों को,
तबाह करने के लिये  ढूंढ़ रहे  हैं।
 ये  रूपए, उपहार,
 मुझे नहीं चाहिये,
जो मिले  मां-पिता  से  
तुम में वो संस्कार चाहिये।
ये रक्षा का  अटूट बंधन,
भारत में है  सदियों पुराना,
मुझे ये वचन देकर
तुम भी इसे सदा निभाना।
आप सभी को पावन पर्व रक्षाबंधन की असंख्य शुभकामनाएं...

मंगलवार, अगस्त 16, 2016

हे भारत! आज तुम बिलकुल अकेले हो...

हे भारत
आज तुम बिलकुल अकेले हो,
इस महाभारत के रण में,
न कृष्ण है
न अर्जुन,
न धर्मराज,
आज विदुर भी,
तुम्हारा हित नहीं चाहता।
भिष्म द्रौण
और कृपाचार्य की निष्ठा,
आज मात्रभूमि के प्रति नहीं,
कुर्सी के प्रति है...
आज भी जंग भी,
सिंहासन के लिये ही है,
पर आज के राजा,
तुम्हारी खुशहाली नहीं,
अपनी खुशहाली चाहते हैं,
अब सत्य कोई नहीं बोलते,
न टीवी चैनल, न अखबार,
न लेखक न कवि,
न विद्वान न ज्ञानी,
इस लिये जंता भी  भ्रमित है।
सुभाष जैसों को आज भी,
कहीं नजरबंद किया जा रहा है...

सोमवार, अगस्त 15, 2016

बच सकेगी हमारी स्वतंत्रता है।


आप सभी को भारत के पावन पर्व स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनाएं...
जो नहीं कहते  वंदे मातरम,
पाकिस्तानी झंडा लहराते हैं,
जो दे रहे हैं देश को गाली
वो कौन है? वो कौन हैं?
जो पनाह देते हैं, आतंकवादियों को,
भारत को खंडित करना चाहते हैं,
अफजल की फांसी का विरोध करने वाले,
वो कौन है,? वो कौन हैं?
ये वोही है, जिनके कारण,
हमलावर देश में आये,
कई वर्षों तक  यहां जुल्म किये,
मंदिर तक भी गिराए।
न हिंदू हैं वो,
न वो मुस्लमान हैं,
न उन्होंने कभी गीता पढ़ी है,
न पढ़ी कुराण है।
जब तक जिवित हैं, जयचंद यहां,
भारत मां को खतरा है,
इनकी जडें उखाड़ फैंको,
बच सकेगी हमारी स्वतंत्रता है।

सोमवार, अगस्त 01, 2016

नहीं आयेगा, अब वो सावन...

न बच्चों के हाथ में,
कागज की कश्तियाँ
न इंतजार है,
परदेस से   पिया का।
नहीं दिखते अब
   झूलें बागों में,
  न मेलों मे रौनक,
न तीज त्योहारों में।
अब तो सावन
डराता है,
विक्राल रूप
दिखाता है।
कहीं बाड़ आती है,
कहीं फटते हैं बादल,
होती है प्रलय,
करहाते हैं मानव।
सूखे नाले भी
कोहराम मचाते हैं,
गांव, शहर,
बहा ले जाते हैं।
न वो हरियाली,
न वो रौनक,
नहीं आयेगा,
अब वो सावन...



मंगलवार, जुलाई 19, 2016

पर भविष्य से खेलते हैं...

मैं एकलव्य हूं,
मेरी रुह आहत नहीं हुई,
जब गुरु द्रोणाचार्य ने
अर्जुन को विश्व का सर्वश्रेष्ठ धर्नुधारी बनाने के लिये 
मुझ  से गुरु-दक्षिणा में,
मेरे दाहिने हांथ का अँगूठा मांगा था...
मेरे गुरु ने तो केवल
मेरे दाहिने हांथ का अँगूठा ही  मांगा था
जो सहहर्ष मैंने दे दिया था,
आज मेरा नाम तो,
गुरु द्रोणाचार्य और  अर्जुन से भी
 अधिक आदर से लिया जाता है...
 न मेरा जन्म राजवंश में हुआ,
न मेरा ऊंचा कुल था,
न सर्वश्रेष्ठ बनने की कामना,
मेरी गुरु पर श्रधा थी,
एकग्रता ने मुझे पहचान दी
मेरी  निष्ठा ही मेरे  काम आयी...
आज न मैं हूं,
न मेरे गुरु द्रोणाचार्य
न वो शिक्षा रहीं,
न सत्य को लिखने वाले,
अगर आज मेरे साथ वो अन्याय होता,
तो सत्य दब जाता कागजों में ही...
 आज मेरी रुह भी आहत है,
जब देखता हूं, सुनता हूं,
उन गुरुओं के बारे में,
जिनकी निष्ठा पैसे पर है,
जो गुरु-दक्षिणा तो नहीं मांगते,
पर भविष्य से खेलते हैं...


शुक्रवार, जुलाई 08, 2016

कलयुग में राम अवतार का...

आतंकवाद का जन्म
भूख से हुआ,
जेहाद के कारण,
पला-बढ़ा,
जैसे त्रेता युग में,
राक्षसों ने था आतंक मचाया,
वैसे ही   सारी दुनिया में,
भय है आतंकवाद का...
आतंकवादी तो  बेचारा,
क्या करे हालात  का मारा,
खिलौने नहीं, शस्त्र  मिले,
प्रेम नहीं, डंडे खाए,
ज्ञान  नहीं, जनून बढ़ाया,
मन से मौत का भय मिटाया।
न जीवन का मोह,
न प्रेम किसी से....
ये दानव भी नहीं,
महा दानव है कोई,
न धर्म  है इनका,
न इमान कोई।
कांपती है भारत मां  जब,
सुनते हैं पुकार देवता सब,
समझो  समय आ गया है,
कलयुग में  राम   अवतार का...

   

मंगलवार, जून 28, 2016

मैंने घर नहीं, एक मकान बनाया है....

आज सुबह फिर
मेरे पड़ोस से,
हंसमुख दादा   की
वोही आवज सुनाई दी,
"अब हाथ में लाठी,
आंख पे ऐनक,
थके पांव,
तन पे झुर्रियाँ
न मुंह में दांत,
झड़ गये बाल
बोलो बेटा
अब कहां जाऊं"...
याद आया मुझे,
एक दिन खलियान में,
हंस मुख दादा,
अपने मित्र से रोते हुए बोले थे,
"एक ख्वाइश थी,
अपना घर हो,
ख्वाइश पूरी करने के लिये,
दिन रात एक किये,
घर बन भी गया,
पर आज पता चला,
मैंने घर नहीं,
एक मकान बनाया है"....

शुक्रवार, जून 17, 2016

अब क्या करें?

शौक आदत बन गयी
अब क्या करें?
नशा है जहर
अब क्या करें?
आशाएं मां-बाप की
दर दर भटक रही,
उनके बिखरे  अर्मानों का,
अब क्या करें?
समझाया था बहुत
न सुनी तब  किसी की,
ओ समझाने वालों बताओ,
अब क्या करें?
न होष है खुद की
न पास है कोई हितेशी, 
 जीवन है अनुमोल,
अब क्या करें?
वो दोस्त  भी तबाह है
जिसके साथ धुआं उड़ाया,
जेब भी है  खाली,
अब क्या करें?
ऐ दोस्त तुने मुझे,
नशे की जगह जहर दिया  होता,
न जीना पड़ता इस हाल में,
अब क्या करें?


मंगलवार, मई 17, 2016

हम बंद कमरों में बैठे हैं

हम बंद कमरों में बैठे हैं,
पंछी तो गीत गाते हैं,
मां  के पास वक्त नहीं है,
 बच्चे लोरी सुनना चाहते हैं।
न कल कल झरनों नदियों की,
न किलकारियां मासूम बच्चों की,
संगीत नहीं है जीवन में,
निरसता में पल बिताते हैं।
वर्षों बाद  गया    चमन में,
लगा जैसे स्वर्ग यहीं है,
क्रितरिम हवा पानी से,
हम अपनी उमर घटाते हैं।
होता है जब  घरों  में बंटवारा,
सूई तक भी बांटी जाती है,
मां-बाप नहीं बंटते,
न कोई उनको पाना  चाहते हैं।
पैसा है उपयोग के लिये,
हम उपयोग मानव का करते हैं,
जोड़-जोड़ के पैसा रखते,
मानव को दूर भगाते हैं।

शनिवार, मई 07, 2016

काम नहीं नाम बिकता है...

सरहदों पर
खड़े हैं रक्षक
घर से दूर
मां की रक्षा के लिये।
पर हम नहीं जानते  उन्हें
बच्चे भी नहीं पहचानते उन्हें
क्योंकि उनकी लाइव कर्वेज नहीं होती।
 वे   अभिनय भी  नहीं कर रहे हैं।
उनका भाग्य मैदानों में लगने वाले
चौकों छक्कों पर निर्भर नहीं होता।
कहते हैं न,
जो दिखता है, वोही  बिकता है।
 एक किसान
 सब से अधिक काम करता है,
सुबह से शाम तक,
रात को भी नहीं सोता,
रखवाली करता है फसल की।
चिंता सताती है कर्ज की।
कई बार तो
दुखी होकर
आत्महत्या भी कर देता है।
क्योंकि वो जानता है
हमारे देश में
काम नहीं नाम बिकता है...