मंगलवार, अक्तूबर 29, 2013

जिसने इसे पत्थर बनाया...



सुबह चलते हुए पथ में,
पैर एक पत्थर से टकराया,
चोट लगी कुछ रक्त  बहा,
फिरक कदम आगे को बढ़ाया।
गलती  मेरी ही थी,
जिसे संभल कर न चलना आया।
दोषीतो  वो है,
जिसने इसे पत्थर बनाया।
खुद भी खाता है ये सब की ठोकर,
न खुद ये इस पथ पे आया।

8 टिप्‍पणियां:

  1. सुन्दर रचना -
    आदरणीय भाई जी-
    बहुत बहुत शुभकामनायें-

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  2. बेचारा पत्थर ... किस्मत की बात है ...

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  3. बहुत सुंदर ! फिरक को फिर एक कर लें ए टंकित होने से रह गया है !

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  4. बेहद की खूबसूरती ,अभिनव रूपकत्व लिए हैं तमाम गज़लें।

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  5. उम्दा भावपूर्ण प्रस्तुति...बहुत बहुत बधाई...
    नयी पोस्ट@ग़ज़ल-जा रहा है जिधर बेखबर आदमी

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