मंगलवार, जनवरी 07, 2014

अब तो चलना सीख लिया है...



अब तो चलना सीख लिया है,
पत्थर और अंगारों मे,
खड़ा खड़ा अब नहीं थकता,
इन लंबी लंबी कतारों में।
गांव मुझे बुलाता है,
याद भी बहुत आता है,
वहां सब कुछ मेरा अपना था,
यहां ढूंढ़ता हूं सब कुछ बाज़ारों में।
पैसा है सब कुछ,   जाना अब,
जब बिकते धेखा पैसे में सब,
मैं कैसे चढ़ाता  पुष्प मंदिर मे,
वहां चढ़ रहा था चढ़ावा हजारों में।
बच्चों को जमीन पे रोते देखा,
कुत्तों  को बिसतर पर  सोते देखा,
तन पर वस्तर  नहीं है,
संगमरमर  जड़ें  हैं दिवारों में।

9 टिप्‍पणियां:

  1. सुन्दर प्रस्तुति-
    आभार आपका-

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  2. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (08-01-2014) को "दिल का पैगाम " (चर्चा मंच:अंक 1486) पर भी है!
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  3. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन जले पर नमक - ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  4. समाज में फैले विरोधाभास को बड़ी सुन्दरता से बयान किया है आपने !
    नई पोस्ट सर्दी का मौसम!
    नई पोस्ट लघु कथा

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  5. आपकी इस ब्लॉग-प्रस्तुति को हिंदी ब्लॉगजगत की सर्वश्रेष्ठ कड़ियाँ (3 से 9 जनवरी, 2014) में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,,सादर …. आभार।।

    कृपया "ब्लॉग - चिठ्ठा" के फेसबुक पेज को भी लाइक करें :- ब्लॉग - चिठ्ठा

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  6. सुन्दर प्रस्तुति

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  7. भावपूर्ण प्रस्तुति ...

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